श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.56.7 
पश्य भल्लातकान् बिल्वान् नरैरनुपसेवितान्।
फलपुष्पैरवनतान् नूनं शक्ष्याम जीवितुम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
देखो, ये भिलवा और बेल के वृक्ष अपने फूलों और फलों के भार से झुके हुए हैं। चूँकि अन्य मनुष्यों का यहाँ आना सम्भव नहीं है, इनका उपयोग नहीं हुआ है; अतः इन फलों से हम अवश्य अपना निर्वाह कर सकेंगे।॥7॥
 
‘Look, these bhilwa and bael trees are bent down with the weight of their flowers and fruits. Since it is not possible for other humans to come here, they have not been used by them; hence we will certainly be able to sustain ourselves with these fruits.'॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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