श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.56.6 
आदीप्तानिव वैदेहि सर्वत: पुष्पितान् नगान्।
स्वै: पुष्पै: किंशुकान् पश्य मालिन: शिशिरात्यये॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'विदेहराजनन्दिनी! इस वसन्त ऋतु में सर्वत्र खिले हुए इन पलाश वृक्षों को देखो। ये अपने ही पुष्पों की माला से आच्छादित प्रतीत होते हैं और उन पुष्पों की लालिमा से प्रज्वलित प्रतीत होते हैं।॥6॥
 
'Videharajnandini! Look at these Palaash trees blooming everywhere in this spring season. They look like they are garlanded with their own flowers and appear to be ablaze due to the red glow of those flowers.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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