श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.56.27 
तत् तु पक्वं समाज्ञाय निष्टप्तं छिन्नशोणितम्।
लक्ष्मण: पुरुषव्याघ्रमथ राघवमब्रवीत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
रक्तविकार को नष्ट करने वाले गजकण्ड को भलीभाँति पका हुआ जानकर लक्ष्मण ने पुरुषसिंह श्री रघुनाथजी से कहा- ॥27॥
 
Knowing that Gajkand, which destroys blood disorders, was well ripe, Lakshmana said to Purushasingh Shri Raghunathji - ॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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