श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.56.23 
मृगं हत्वाऽऽनय क्षिप्रं लक्ष्मणेह शुभेक्षण।
कर्तव्य: शास्त्रदृष्टो हि विधिर्धर्ममनुस्मर॥ २३॥
 
 
अनुवाद
हे शुभचिंतक लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही 'गजकंद' नामक कंद को खोदकर या उखाड़कर यहाँ ले आओ; क्योंकि शास्त्रविधि से कर्म करना हमारा कर्तव्य है। तुम सदैव धर्म का ही चिंतन करो।॥ 23॥
 
'Well-wisher Lakshman! You should dig up or uproot the tuber called 'Gajakand' and bring it here quickly; because performing the rituals prescribed in the scriptures is our duty. You should always think about Dharma.'॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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