श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.56.21 
तां निष्ठितां बद्धकटां दृष्ट्वा राम: सुदर्शनाम्।
शुश्रूषमाणमेकाग्रमिदं वचनमब्रवीत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वह कुटिया भीतर और बाहर से लकड़ी की दीवारों से मजबूत बनी हुई थी और ऊपर से वर्षा आदि से बचाने के लिए ढकी हुई थी। वह बहुत ही सुंदर लग रही थी। उसे तैयार देखकर श्री राम ने लक्ष्मण से, जो एकाग्रचित्त होकर उनकी बात सुन रहे थे, कहा -॥ 21॥
 
That hut was made strong from inside and outside with wooden walls and was covered from above to prevent rain etc. It looked very beautiful. Seeing it ready, Shri Ram said to Lakshman who was listening to him with full concentration -॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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