श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.56.19 
लक्ष्मणानय दारूणि दृढानि च वराणि च।
कुरुष्वावसथं सौम्य वासे मेऽभिरतं मन:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे लक्ष्मण! वन से अच्छी और मजबूत लकड़ी लाकर मेरे रहने के लिए एक झोपड़ी तैयार करो। मुझे यहीं रहने की इच्छा हो रही है।॥19॥
 
'Gentle Lakshman! Bring good and strong wood from the forest and prepare a hut for me to live in. I feel like staying here.'॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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