श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.56.14 
मनोज्ञोऽयं गिरि: सौम्य नानाद्रुमलतायुत:।
बहुमूलफलो रम्य: स्वाजीव: प्रतिभाति मे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सौम्य! यह पर्वत अत्यंत सुंदर है। नाना प्रकार के वृक्ष और लताएँ इसकी शोभा बढ़ा रही हैं। यहाँ अनेक फल और मूल हैं; यह सचमुच अत्यंत सुंदर है। मुझे ऐसा लगता है कि यहाँ अत्यंत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है॥ 14॥
 
‘Soumya! This mountain is very beautiful. Various types of trees and creepers enhance its beauty. There are many fruits and roots here; it is indeed beautiful. I feel that one can live a very happy life here.॥ 14॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd