श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 56: श्रीराम आदि का चित्रकूट में पहुँचना, वाल्मीकिजी का दर्शन करके श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणद् वारा पर्णशाला का निर्माण,सबका कुटी में प्रवेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.56.11 
समभूमितले रम्ये द्रुमैर्बहुभिरावृते।
पुण्ये रंस्यामहे तात चित्रकूटस्य कानने॥ ११॥
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! हम लोग चित्रकूट के पवित्र वन में बड़े आनन्द से विचरण करेंगे, जहाँ की भूमि समतल है और बहुत से वृक्षों से युक्त है।’ ॥11॥
 
'Father, we will wander with great joy in the sacred forest of Chitrakoot, where the land is flat and is filled with many trees.' ॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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