श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 55: श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तट पर रात्रि में निवास करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.55.5 
अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्रोत:समागताम्।
तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव।
तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! तत्पश्चात गंगाजी के जल के विपरीत दिशा में मुड़ी हुई यमुना नदी के पास पहुँचकर, आने-जाने वाले मनुष्यों के पदचिह्नों से चिह्नित उस घाट का अवलोकन करके, वहाँ जाकर, एक नाव बनाकर, सूर्यकन्या को उसी पर सवार होकर यमुना नदी को पार करना चाहिए॥5॥
 
Raghunandan! Thereafter, reaching the Yamuna river which is bent in the opposite direction of the flow of the Ganges' water, after observing the landing site (ghat for crossing the river) which is marked by the footprints of the people coming and going, go there and after making a raft, Suryakanya should cross the Yamuna using the same.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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