श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 55: श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तट पर रात्रि में निवास करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.55.28 
यद् यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा।
तत् तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘विदेहपुत्री सीता जो भी फल या पुष्प मांगे अथवा जो भी वस्तु उसे प्रसन्न करे, वही उसे देते रहो।’॥28॥
 
‘Whatever fruit or flowers Sita, the daughter of the Videha clan, asks for, or whatever thing makes her happy, keep giving it to her.’॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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