श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 55: श्रीराम आदि का अपने ही बनाये हुए बेडे से यमुनाजी को पार करना, सीता की यमुना और श्यामवट से प्रार्थना,यमुनाजी के समतल तट पर रात्रि में निवास करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.55.24 
न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत।
नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्व्रतम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वटवृक्ष के पास पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीता ने उसे सिर नवाकर कहा- 'महावृक्ष! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ। कृपा करके कुछ ऐसा करो कि मेरे पति अपना वनवास व्रत पूरा कर लें॥ 24॥
 
Reaching near the banyan tree, Videhanandini Sita bowed her head to it and said- 'Mahavriksha! I salute you. Kindly do something so that my husband completes his vow of exile.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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