श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.54.5 
प्रयागमभित: पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम्।
अग्नेर्भगवत: केतुं मन्ये संनिहितो मुनि:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रनन्दन! वहाँ देखो, प्रयाग के निकट अग्निदेव के ध्वज के समान एक महान् धुआँ उठ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋषि भारद्वाज यहीं हैं।'
 
'Sumitra Nandan! Look there, near Prayag, a great smoke is rising in the form of the flag of Lord Agnidev. It seems that sage Bharadwaj is here. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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