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श्लोक 2.54.43  |
प्रहृष्टकोयष्टिभकोकिलस्वनै-
र्विनोदयन्तं च सुखं परं शिवम्।
मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरै:
सुरम्यमासाद्य समावसाश्रयम्॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| वह पर्वत हर्षित कोयल और कूकती हुई चिड़ियों की आवाज से यात्रियों का मनोरंजन करता है। वह अत्यंत सुहावना और मंगलमय है। मदमस्त मृगों और मदमस्त हाथियों के समूह से उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है। तुम उस पर्वत पर जाकर वहीं डेरा डालो और वहीं रहो।॥ 43॥ |
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| ‘That mountain entertains travellers with the chirping of the joyous sandpipers and cuckoos. It is extremely pleasant and auspicious. Its beauty is further enhanced by the intoxicated deer and the large number of intoxicated elephants. You should go to that mountain and camp there and live there.’॥ 43॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:पञ्चाश: सर्ग:॥ ५४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥ |
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