श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  2.54.41-42 
पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुत:।
तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चैव हि॥ ४१॥
विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव।
सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान्।
चरत: सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वह पर्वत अत्यंत पवित्र, सुन्दर और अनेक फलों और मूलों से युक्त है। वहाँ वन में हाथियों और मृगों के समूह विचरण करते हैं। हे रघुनन्दन! तुम उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे। मंदाकिनी नदी, अनेक जलस्रोत, पर्वत शिखर, गुफाएँ, कंदराएँ और झरने भी देखोगे। सीता के साथ विहार करते समय वह पर्वत तुम्हारे मन को आनंदित करेगा॥ 41-42॥
 
‘That mountain is extremely sacred, beautiful and is blessed with numerous fruits and roots. Herds of elephants and deer roam around in the forest there. O Raghunandan! You will see them all in person. You will also see the Mandakini river, numerous water sources, mountain peaks, caves, caverns and waterfalls. That mountain will give joy to your mind while roaming with Sita.॥ 41-42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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