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श्लोक 2.54.34  |
तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुष:।
प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्रा: कथयत: कथा:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| प्रयाग में श्री रामचन्द्रजी महर्षि के पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतने में ही वह शुभ रात्रि आ गई॥34॥ |
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| In Prayag, Shri Ramchandraji kept sitting near Maharishi and talking strange things, in the meanwhile the auspicious night arrived. 34॥ |
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