श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.54.34 
तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुष:।
प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्रा: कथयत: कथा:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
प्रयाग में श्री रामचन्द्रजी महर्षि के पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतने में ही वह शुभ रात्रि आ गई॥34॥
 
In Prayag, Shri Ramchandraji kept sitting near Maharishi and talking strange things, in the meanwhile the auspicious night arrived. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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