श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.54.32 
प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवत: सुखम्।
इह वा वनवासाय वस राम मया सह॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
मैं उसी पर्वत को आपके एकांतवास के लिए उपयुक्त और सुखदायी मानता हूँ। हे राम! आप वनवास के उद्देश्य से मेरे साथ इसी आश्रम में रहिए। ॥32॥
 
"I consider that very mountain to be suitable and pleasant for you to live in solitude. O Lord Rama! You stay with me in this ashram for the purpose of exile." ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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