श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  2.54.24-25 
भगवन्नित आसन्न: पौरजानपदो जन:।
सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम्॥ २४॥
आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जन:।
अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'भगवन्! मेरे नगर और जिले के लोग इस स्थान के बहुत निकट हैं, अतः मुझे लगता है कि लोगों को यहाँ मुझसे मिलने में आसानी होगी और वे मुझे तथा सीता को देखने के लिए इस आश्रम में आते रहेंगे; अतः मुझे यहाँ रहना उचित नहीं लगता।
 
'Lord! The people of my city and district are very close to this place, therefore I think that people will find it easy to meet me here and will keep coming to this ashram to see me and Sita; therefore it does not seem right to me to stay here.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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