श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.54.21 
चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम्।
श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'हे ककुत्स्थकुल के स्वामी श्री राम! मैं बहुत दिनों से इस आश्रम में आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था (आज मेरी मनोकामना पूर्ण हुई है)। मैंने यह भी सुना है कि आपको अकारण वनवास दे दिया गया है।
 
'O lord of the Kakutsthakul, Shri Ram! I have been waiting for your arrival at this ashram for a long time (today my wish has been fulfilled). I have also heard that you have been exiled without any reason.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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