श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 54: लक्ष्मण और सीता सहित श्रीराम का भरद्वाज-आश्रम में जाना, मुनि का उन्हें चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश तथा चित्रकूट की महत्ता एवं शोभा का वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.54.15 
पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुज: प्रिय:।
अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'पिता की आज्ञा से मुझे वन की ओर आते देख सुमित्रा के पुत्र मेरे प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण ने भी वन में रहने की प्रतिज्ञा कर ली है और वे मेरे पीछे-पीछे चले आए हैं।॥15॥
 
'Seeing me coming towards the forest on father's orders, my dear younger brother Lakshmana, the son of Sumitra, has also taken a vow to stay in the forest and has followed me.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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