श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.53.8 
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विना कृत:।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेय्या वशमागत:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
महाराज इस समय अनाथ और वृद्ध हो गए हैं, क्योंकि उनके पुत्र का कोई रक्षक नहीं है। उन्हें मेरा वियोग सहना पड़ रहा है। उनकी मनोकामना अधूरी रह गई और वे कैकेयी के हाथों में पड़ गए हैं। ऐसी स्थिति में वे बेचारे अपनी रक्षा क्या करेंगे?॥8॥
 
‘Maharaj is orphaned and old at this time because there is no protector of his son. He has to face my separation. His desire remained unfulfilled and he has fallen into the hands of Kaikeyi. In such a situation, what will the poor soul do to protect himself?॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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