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श्लोक 2.53.35  |
ततस्तु तस्मिन् विजने महाबलौ
महावने राघववंशवर्धनौ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु-
र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् उस महान् निर्जन वन में रघुवंश की वृद्धि करने वाले वे दोनों पराक्रमी वीर, पर्वत शिखर पर विचरण करने वाले दो सिंहों के समान, कभी भयभीत या चिन्ताग्रस्त नहीं हुए। |
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| Thereafter, in that great and uninhabited forest, those two mighty heroes who increased the Raghuvansh (dynasty) lineage, were never afraid or anxious, like two lions roaming on the mountain peak. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाश: सर्ग:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥ |
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