श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.53.34 
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो
निशम्य चैवं वनवासमादरात्।
समा: समस्ता विदधे परंतप:
प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघव:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण द्वारा वनवास के विषय में आदरपूर्वक कहे गए इन उत्तम वचनों को सुनकर शत्रुओं को पीड़ा देने वाले रघुनाथजी ने स्वयं दीर्घकाल तक वनवास का धर्म स्वीकार किया और लक्ष्मण को वर्षों तक अपने साथ वन में रहने की अनुमति दे दी।
 
Having heard these excellent words spoken by Lakshman respectfully regarding exile, Raghunatha, the tormentor of enemies, himself accepted the dharma of exile for a long time and gave permission to Lakshman to stay with him in the forest for all the years.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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