श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.53.32 
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परंतप।
द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं को कष्ट देने वाले रघुवीर! आज आपके बिना मैं न तो पिता को देखना चाहता हूँ, न भाई शत्रुघ्न को, न माता सुमित्रा को और न ही स्वर्ग को।
 
'Raghuvir, who gives trouble to the enemies! Without you, today I do not want to see either father, brother Shatrughna, mother Sumitra or even heaven.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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