श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.53.31 
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविवोद्‍धृतौ॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'रघुनंदन! आपके बिना सीता और मैं दो क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। जैसे जल से निकाली गई मछली जीवित नहीं रह सकती॥31॥
 
‘Raghunandan! Without you Sita and I cannot survive even for two moments. Just like a fish taken out of the water cannot survive.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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