श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.53.3 
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयो:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! आज से हम दोनों भाइयों को आलस्य त्यागकर रात्रि में जागना होगा; क्योंकि सीता का कल्याण हम दोनों के हाथ में है॥3॥
 
'Lakshmana! From today onwards both of us brothers will have to give up our laziness and stay awake at night; because Sita's welfare is in the hands of both of us.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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