श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.53.21 
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम्।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रनन्दन! कोई सौभाग्यवती स्त्री मेरे समान पुत्र को कभी जन्म न दे; क्योंकि मैं अपनी माता को अनन्त दुःख पहुँचा रहा हूँ॥ 21॥
 
'Sumitra Nandan! May no fortunate woman ever give birth to a son like me; because I am causing endless grief to my mother.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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