श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 53: श्रीराम का राजा को उपालम्भ देते हुए कैकेयी से कौसल्या आदि के अनिष्ट की आशङ्का बताकर लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने के लिये प्रयत्न करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.53.15 
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता।
कौसल्यां च सुमित्रां च सा प्रबाधेत मत्कृते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘अब भी कैकेयी अपने सौभाग्य के मद में मदमस्त होकर मेरे कारण कौशल्या और सुमित्रा को कष्ट दे सकती है।॥15॥
 
‘Even now Kaikeyi, intoxicated by her good fortune, can cause trouble to Kausalya and Sumitra on my account.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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