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श्लोक 2.53.14  |
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| 'सौम्य! मैं तो यही सोचती हूँ कि कैकेयी राजा दशरथ का अन्त करने, मुझे देश से निकालने और भरत को राज्य दिलाने के लिए ही इस महल में आई है॥ 14॥ |
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| 'Soumya! I think that Kaikeyi came to this palace only to end the life of King Dasharath, to expel me from the country and to give the kingdom to Bharat.॥ 14॥ |
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