श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.52.98 
प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम्।
विषमं च प्रपातं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
‘अब वे ऐसे वन में प्रवेश करेंगे, जहाँ किसी मनुष्य के आने-जाने का कोई चिह्न न होगा, न धान के खेत होंगे, न चलने के लिए बगीचे होंगे। जहाँ ऊबड़-खाबड़ भूमि और गड्ढे होंगे, जिनमें गिरने का भय रहेगा।’॥98॥
 
‘Now they will enter such a forest, where no signs of human coming and going will be visible, there will be no paddy fields, no gardens to walk in. Where there will be uneven land and pits in which there will be a fear of falling.’॥98॥
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