श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 94-96
 
 
श्लोक  2.52.94-96 
अथाब्रवीन्महाबाहु: सुमित्रानन्दवर्धनम्।
भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा॥ ९४॥
अवश्यं रक्षणं कार्यं मद्विधैर्विजने वने।
अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु॥ ९५॥
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन्।
अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाबाहु श्री राम सुमित्रानन्दन लक्ष्मण से बोले - 'सुमित्रकुमार! अब तुम प्रयत्नपूर्वक वन में सीता की रक्षा करो। हम जैसे मनुष्यों को निर्जन वन में स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। अतः तुम आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगी और मैं पीछे-पीछे सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ चलूँगा। पुरुषप्रवर! हम दोनों को एक-दूसरे की रक्षा करनी चाहिए। 94-96॥
 
Thereafter, the mighty-armed Shri Ram Sumitranandan said to Lakshman - 'Sumitra Kumar! Now be careful to protect Sita in the cultivated or deserted forest. People like us must protect women in the deserted forest. Therefore, you walk ahead, Sita follows you and I will walk at the back, protecting Sitaki and you. Purushpravar! We should protect each other. 94-96॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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