श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.52.86 
त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे।
भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
हे देवि, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों मार्गों में विचरण करने वाली! आप यहाँ से ब्रह्मलोक तक व्याप्त हैं और इस लोक में समुद्रराज की पत्नी के रूप में प्रकट होती हैं। 86.
 
‘O Goddess who roams the three paths of heaven, earth and underworld! You are spread from here to Brahmaloka and appear in this world as the wife of the King of the Ocean. 86.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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