श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.52.85 
ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता।
यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
हे सौभाग्यवती गंगा! जब मैं अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण करके सकुशल वन से लौट आऊँगा, तब बड़े हर्ष के साथ आपकी पूजा करूँगा।
 
'Fortunate Goddess Ganga! At that time, when I return safely from the forest, having fulfilled all my desires, I will worship you with great joy. 85.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)