श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.52.78 
राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां तत:।
ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मन:॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
महातेजस्वी श्री रामचन्द्रजी भी उस नाव पर चढ़कर ‘दिव्य नौका’ आदि वैदिक मन्त्रों का जप करने लगे, जो ब्राह्मण और क्षत्रियों के हित के लिए जपने योग्य हैं॥78॥
 
Mahatejasvi Shri Ramchandraji also, after boarding that boat, started chanting Vedic mantras like 'Divine Boat' etc. which are suitable for Brahmins and Kshatriyas to chant for their benefit. 78॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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