श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.52.66 
नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने।
अवश्यमाश्रमे वास: कर्तव्यस्तद‍्गतो विधि:॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
निषादराज गुह! इस समय मेरे लिए वन में रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपद के लोग प्रायः आते-जाते रहते हैं। अब मुझे किसी निर्जन वन में आश्रम बनाकर रहना होगा। इसके लिए मुझे जटाधारी आदि आवश्यक अनुष्ठान करने होंगे।
 
‘Nishadraj Guha! At this time it is not appropriate for me to live in a forest where people from the district come and go frequently. Now I must live in an ashram in a secluded forest. For this I must follow the necessary rituals like wearing matted hair.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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