श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  2.52.60 
जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल।
शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमित:॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
'सुमन्त्रजी! आप स्वामी के प्रति स्नेह रखते हैं। मैं आपके प्रति अपनी महान भक्ति को जानता हूँ; फिर भी मैं आपको यहाँ से अयोध्यापुरी किस कार्य के लिए भेज रहा हूँ, उसे सुनिए।'
 
‘Sumantraji! You are affectionate towards Swami. I know your great devotion towards me; still listen to the work for which I am sending you from here to Ayodhyapuri. 60.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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