श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.52.58 
भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि।
भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या न मा त्वं हातुमर्हसि॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
अतः हे भक्त-प्रेमी! आप मेरे स्वामी के पुत्र हैं। मैं आपके मार्ग पर चलने और आपकी सेवा करने को तत्पर हूँ। मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, मैं आपका सेवक हूँ और सेवक की मर्यादा में हूँ; अतः आप मुझे त्याग न दें॥ 58॥
 
‘Therefore, O devotee-loving one! You are the son of my master. I am ready to walk along the path you are walking and serve you. I have devotion towards you, I am your servant and I am within the limits of a servant; therefore, please do not abandon me.’॥ 58॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas