श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.52.57 
चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने।
क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं वन में आपके साथ रहूँ तो ये चौदह वर्ष मेरे लिए चौदह क्षण के समान होंगे। अन्यथा ये चौदह सौ वर्षों के समान प्रतीत होंगे। 57.
 
‘If I am with you in the forest these fourteen years will pass like fourteen moments for me. Otherwise they will seem like fourteen hundred years. 57.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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