श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.52.55 
नहि शक्या प्रवेष्टुं सा मयायोध्या त्वया विना।
राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जैसे सदाचाररहित मनुष्य इन्द्र की राजधानी स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता, वैसे ही आपके बिना मैं अयोध्यापुरी में नहीं जा सकता॥ 55॥
 
‘Just as a person without moral conduct cannot enter Indra's capital, heaven, similarly without you I cannot go to Ayodhyapuri.॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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