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श्लोक 2.52.51  |
त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्याकृतं सुखम्।
आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम्॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| ‘श्रीराम! आपकी कृपा से मुझे आपको रथ पर लाकर यहाँ लाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब आपकी कृपा से मुझे आपके साथ वन में रहने का सुख प्राप्त होगा॥ 51॥ |
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| ‘Shri Ram! By your grace I had the pleasure of bringing you here in a chariot. Now by your grace I hope to have the pleasure of living with you in the forest.॥ 51॥ |
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