श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  2.52.45-46 
अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया।
नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति॥ ४५॥
असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम्।
कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वच:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
क्या मैं जाकर महारानी कौशल्या से कहूँ कि मैंने आपके पुत्र को उसके मामा के घर भेज दिया है? अतः आप दुःखी न हों, यह बात मुझे प्रिय होने पर भी झूठ है, अतः मैं ऐसा झूठ कभी नहीं बोल सकता। फिर मैं यह अप्रिय सत्य कैसे कह सकूँगा कि मैंने आपके पुत्र को वन में भेज दिया है॥ 45-46॥
 
‘Shall I go and tell Queen Kausalya that I have sent your son to his maternal uncle's house? So do not be upset, this is a lie even though it is dear to me, hence I can never say such a lie. Then how will I be able to tell this unpleasant truth that I sent your son to the forest.॥ 45-46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)