| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना » श्लोक 41 |
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| | | | श्लोक 2.52.41  | दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम्।
सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे॥ ४१॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे युद्ध में जब उसका स्वामी, वीर सारथी मारा जाता है और केवल सारथी ही शेष रह जाता है, तब ऐसे रथ को देखकर उसकी अपनी सेना दयनीय हो जाती है, वैसे ही तुम्हारे द्वारा त्यागे गए मेरे इस रथ को देखकर सारी अयोध्या नगरी दयनीय हो जाएगी॥ 41॥ | | | | 'Just as in a war, when its master, a valiant charioteer, is killed and only the charioteer is left, his own army becomes pitiable on seeing such a chariot, similarly, the entire city of Ayodhya will become pitiable on seeing this chariot of mine deserted by you.॥ 41॥ | | ✨ ai-generated | | |
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