श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.52.4 
विज्ञाय रामस्य वच: सौमित्रिर्मित्रनन्दन:।
गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अपने मित्रों को प्रसन्न करने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने श्री रामचन्द्रजी के कथन का अर्थ समझ लिया और गुह तथा सुमन्त्र को बुलाकर उनसे पार जाने का प्रबन्ध करने को कहा और स्वयं भी आकर अपने भाई के सामने खड़े हो गए।
 
Sumitra Kumar Laxman, who made his friends happy, understood the meaning of Shri Ramchandraji's statement and called Guh and Sumantra and asked them to make arrangements for crossing and he himself came and stood in front of his brother.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas