श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.52.3 
बर्हिणानां च निर्घोष: श्रूयते नदतां वने।
तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वन में अनकही वाणी बोलने वाले मोरों की भी आवाज सुनाई देती है; हे कोमल! अब हमें वेग से बहने वाली सागरगामी गंगा नदी को पार करना होगा।
 
‘In the forest, the call of the peacocks, who utter unspoken words, is also heard; So gentle! Now we must cross the fast-flowing ocean-going river Ganga.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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