श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.52.28 
न चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो न च शोचति।
अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'न तो मुझे और न ही लक्ष्मण को इस बात का शोक है कि हम अयोध्या छोड़कर चले गए हैं, और न ही हमें वन में रहना पड़ेगा।॥ 28॥
 
'Neither I nor Lakshmana grieve over the fact that we have left Ayodhya or that we will have to live in the forest.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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