श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.52.27 
अदृष्टदु:खं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम्।
ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वच:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'उन श्रेष्ठ, संयमी और वृद्ध महाराजों को मेरी ओर से नमस्कार करो, जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा, और उनसे यह कहो॥ 27॥
 
'Salute on my behalf those noble, self-controlled and aged Maharajas who have never seen sorrow, and tell them this.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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