श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.52.26 
यद् यथा स महाराजो नालीकमधिगच्छति।
न च ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'सुमन्त्रजी! आप जो भी कार्य करें, उसे इस प्रकार करें कि महाराज को किसी अप्रिय बात से दुःख न हो और वे शोक से दुर्बल न हो जाएँ॥ 26॥
 
'Sumantraji! Whatever task you perform, you must do it in a way that does not cause Maharaj to be upset by an unpleasant thing and does not make him weak with grief.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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