श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.52.20 
इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्र: सारथिस्तदा।
दृष्ट्वा दूरगतं रामं दु:खार्तो रुरुदे चिरम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
अपने प्राणों के समान प्रिय श्री रामजी को ऐसा कहकर चले जाने को उद्यत देखकर सारथि सुमन्तर शोक से व्याकुल होकर बहुत देर तक रोते रहे।
 
Seeing Sri Rama, who was as dear to him as his soul, ready to go away after saying such words to him, charioteer Sumantara, distraught with grief, kept weeping for a long time.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas