श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.52.18 
सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन्।
त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रींल्लोकांस्तु जयन्निव॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘वीर रघुनन्दन! (इस प्रकार पिता के सत्य की रक्षा के लिए) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में निवास करके तुम तीनों लोकों को जीतने वाले महापुरुष नारायण के समान परम पद (महान यश) प्राप्त करोगे॥18॥
 
'Veer Raghunandan! (In this way, to protect the truth of the father) by living in the forest with Videhnandini Sita and brother Lakshman, you will attain exaltation (great fame) like the great man Narayana who conquered all the three worlds. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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