श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.52.17 
न मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदय:।
मार्दवार्जवयोर्वापि त्वां चेद् व्यसनमागतम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'जब आप जैसे महापुरुष पर ऐसी विपत्ति आ पड़ी है, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य, वेदों का स्वाध्याय, दया या सरलता भी कोई फल नहीं देगी।॥17॥
 
'When such a calamity has befallen a great man like you, I realize that even celibacy, self-study of the Vedas, kindness or simplicity will not yield any result.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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