श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 52: श्रीराम की आज्ञा से गुह का नाव मँगाना, श्रीराम का सुमन्त्र को समझाबुझाकर अयोध्यापुरी लौट जाने के लिये आज्ञा देना,सीता की गङ्गाजी से प्रार्थना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.52.12 
राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत्।
किमहं करवाणीति सूत: प्राञ्जलिरब्रवीत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उस समय सारथी सुमन्तराम धर्म के ज्ञाता भगवान राम के पास गए और हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक पूछा - 'प्रभो! अब मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?'॥12॥
 
At that time charioteer Sumantram went to Lord Rama, the knower of Dharma, and with folded hands humbly asked - 'Lord! What service can I do for you now?'॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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